पिछले दिनों समूचे मिडिया पर कबाड़ और उसके गोरखधंधे की खबरें सुखिर्यो में रही। खासकर छत्तीसगढ़ के एक उघोगपति द्वारा संचालित इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल ने तो चौबीस घंटे केवल यही खबरें प्रसारित की। एकबारगी तो लगा कि सचमुच छत्तीसगढ़ में इससे बड़ी खबरें कुछ है भी नहीं। दरअसल प्राय: हर चैनल की अपनी मजबूरी है और वहां बैठे लोगों का चाल-ढाल भी कमोबेश वहीं हो जाता है। चौबीसों घंटे चलाने की मजबूरी में उन खबरों को महत्वपूर्ण बना दिया जाता है जो एक दो बार दिखाने के लायक ही होती है। इसके अलावा मीडिया में व्यक्तिगत राय और रूचि भी यादा मायने रखने लगा है। इस सबके बीच पब्लिक के पसंद ना पसंद का कितना ध्यान रखा जा सकता है। यह कोई भी समझ सकता है लेकिन मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया को तो इन बातों से कोई लेना देना ही नहीं है।
अब कबाड़ के गोरखधंधे की खबरों को ही लें। इसे एक चौबीस घंटे न्यूज चैनल ने ऐसा दिखाना शुरू किया मानों इस पूरे पखवाडे क़ी खबर यही एक मात्र है। करीब पन्द्रह दिन तक इस खबर को सनसनीखोज खुलासे की तरह प्रसारित किया गया। इस गोरखधंधे के पीछे कहानी दिखाने की बजाय कुछ एक लोगों को खलनायक की तरह पेश किया गया। हालत यह हो गई कि घंटे-आधे-घंटे की यह खबर प्रसारित होते ही लोगों ने चैनल बदलना शुरू कर दिया। इस सब के पीछे इस चैनल को यहां चला रहे उघोगपति की व्यक्तिगत रूचि साफ दिखने लगी। एक उघोगपति जब मीडिया संचालित करेगा तो वह निडर होकर साफगोई से खबरें कभी प्रसारित नहीं कर सकता और यही बात इस खबर पर भी लागु होने लगा।
मंत्री के भाई और दामाद के यार्ड में छापा पडा तो वह पुराने छापों से संबंधित ही खबरें प्रसारित की। इस खबर पर इसने हिम्मत नहीं जुटाई कि मंत्री के दबाव में भाई व दामाद नहीं पकडे ज़ा रहे। ऐसा तोहमत तो प्रिंट मीडिया पर भी लगने लगा है। जनता हैरान थी कि छोटे-छोटे मामले में मंत्री व अफसरों के दबाव की बात कहने वाली राजधानी की मीडिया मंत्री के दबाव की बात कैसे नहीं छाप रही है। पुलिस का क्या वह तो दबाव में काम करने की आदि हो चुकी है। पर मीडिया पर दबाव... आश्चर्यजनक रूप से छाने लगा है।
पिछले दिनों प्रेस क्लब में इसे लेकर बहस भी हुई। और अब तो अधिकांश पत्रकार पक्षकार की भूमिका में नजर आने लगे हैं। इसकी वजह भी साफ है पहले पत्रकारिता एक मिशन हुआ करता है अब प्रोफेशन हो चुका है। दो रोटी कमाने या घर चलाने की जद्दोजहद ने उन्हें सचेत कर दिया है कि उन्हें मालिक के पसंद ना पसंद का ध्यान रखना आता है। भले ही पत्रकारों के लिए नौकरी का स्कोप बहुत है लेकिन अच्छी संस्था में नौकरी के लिए बिना रीढ़ का बनना जरूरी है।
और अंत में...
एक आर्ड जी ने अपने चहते पत्रकारों से कहा कि मंत्री के दबाव पर कबाड़ माफिया और दामाद भाई को पुलिस नहीं गिरफ्तार कर रही है तो तत्काल एक पत्रकार ने कहा आप तों खाली चाय पिला देते हो और भी तो चाहिए न। फिर आप हमेशा नहीं होगे। नगर भैया को तो यही रहना है।
अब कबाड़ के गोरखधंधे की खबरों को ही लें। इसे एक चौबीस घंटे न्यूज चैनल ने ऐसा दिखाना शुरू किया मानों इस पूरे पखवाडे क़ी खबर यही एक मात्र है। करीब पन्द्रह दिन तक इस खबर को सनसनीखोज खुलासे की तरह प्रसारित किया गया। इस गोरखधंधे के पीछे कहानी दिखाने की बजाय कुछ एक लोगों को खलनायक की तरह पेश किया गया। हालत यह हो गई कि घंटे-आधे-घंटे की यह खबर प्रसारित होते ही लोगों ने चैनल बदलना शुरू कर दिया। इस सब के पीछे इस चैनल को यहां चला रहे उघोगपति की व्यक्तिगत रूचि साफ दिखने लगी। एक उघोगपति जब मीडिया संचालित करेगा तो वह निडर होकर साफगोई से खबरें कभी प्रसारित नहीं कर सकता और यही बात इस खबर पर भी लागु होने लगा।
मंत्री के भाई और दामाद के यार्ड में छापा पडा तो वह पुराने छापों से संबंधित ही खबरें प्रसारित की। इस खबर पर इसने हिम्मत नहीं जुटाई कि मंत्री के दबाव में भाई व दामाद नहीं पकडे ज़ा रहे। ऐसा तोहमत तो प्रिंट मीडिया पर भी लगने लगा है। जनता हैरान थी कि छोटे-छोटे मामले में मंत्री व अफसरों के दबाव की बात कहने वाली राजधानी की मीडिया मंत्री के दबाव की बात कैसे नहीं छाप रही है। पुलिस का क्या वह तो दबाव में काम करने की आदि हो चुकी है। पर मीडिया पर दबाव... आश्चर्यजनक रूप से छाने लगा है।
पिछले दिनों प्रेस क्लब में इसे लेकर बहस भी हुई। और अब तो अधिकांश पत्रकार पक्षकार की भूमिका में नजर आने लगे हैं। इसकी वजह भी साफ है पहले पत्रकारिता एक मिशन हुआ करता है अब प्रोफेशन हो चुका है। दो रोटी कमाने या घर चलाने की जद्दोजहद ने उन्हें सचेत कर दिया है कि उन्हें मालिक के पसंद ना पसंद का ध्यान रखना आता है। भले ही पत्रकारों के लिए नौकरी का स्कोप बहुत है लेकिन अच्छी संस्था में नौकरी के लिए बिना रीढ़ का बनना जरूरी है।
और अंत में...
एक आर्ड जी ने अपने चहते पत्रकारों से कहा कि मंत्री के दबाव पर कबाड़ माफिया और दामाद भाई को पुलिस नहीं गिरफ्तार कर रही है तो तत्काल एक पत्रकार ने कहा आप तों खाली चाय पिला देते हो और भी तो चाहिए न। फिर आप हमेशा नहीं होगे। नगर भैया को तो यही रहना है।
