शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

पत्रकार बने पक्षकार...

पिछले दिनों समूचे मिडिया पर कबाड़ और उसके गोरखधंधे की खबरें सुखिर्यो में रही। खासकर छत्तीसगढ़ के एक उघोगपति द्वारा संचालित इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल ने तो चौबीस घंटे केवल यही खबरें प्रसारित की। एकबारगी तो लगा कि सचमुच छत्तीसगढ़ में इससे बड़ी खबरें कुछ है भी नहीं। दरअसल प्राय: हर चैनल की अपनी मजबूरी है और वहां बैठे लोगों का चाल-ढाल भी कमोबेश वहीं हो जाता है। चौबीसों घंटे चलाने की मजबूरी में उन खबरों को महत्वपूर्ण बना दिया जाता है जो एक दो बार दिखाने के लायक ही होती है। इसके अलावा मीडिया में व्यक्तिगत राय और रूचि भी यादा मायने रखने लगा है। इस सबके बीच पब्लिक के पसंद ना पसंद का कितना ध्यान रखा जा सकता है। यह कोई भी समझ सकता है लेकिन मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया को तो इन बातों से कोई लेना देना ही नहीं है।
अब कबाड़ के गोरखधंधे की खबरों को ही लें। इसे एक चौबीस घंटे न्यूज चैनल ने ऐसा दिखाना शुरू किया मानों इस पूरे पखवाडे क़ी खबर यही एक मात्र है। करीब पन्द्रह दिन तक इस खबर को सनसनीखोज खुलासे की तरह प्रसारित किया गया। इस गोरखधंधे के पीछे कहानी दिखाने की बजाय कुछ एक लोगों को खलनायक की तरह पेश किया गया। हालत यह हो गई कि घंटे-आधे-घंटे की यह खबर प्रसारित होते ही लोगों ने चैनल बदलना शुरू कर दिया। इस सब के पीछे इस चैनल को यहां चला रहे उघोगपति की व्यक्तिगत रूचि साफ दिखने लगी। एक उघोगपति जब मीडिया संचालित करेगा तो वह निडर होकर साफगोई से खबरें कभी प्रसारित नहीं कर सकता और यही बात इस खबर पर भी लागु होने लगा।
मंत्री के भाई और दामाद के यार्ड में छापा पडा तो वह पुराने छापों से संबंधित ही खबरें प्रसारित की। इस खबर पर इसने हिम्मत नहीं जुटाई कि मंत्री के दबाव में भाई व दामाद नहीं पकडे ज़ा रहे। ऐसा तोहमत तो प्रिंट मीडिया पर भी लगने लगा है। जनता हैरान थी कि छोटे-छोटे मामले में मंत्री व अफसरों के दबाव की बात कहने वाली राजधानी की मीडिया मंत्री के दबाव की बात कैसे नहीं छाप रही है। पुलिस का क्या वह तो दबाव में काम करने की आदि हो चुकी है। पर मीडिया पर दबाव... आश्चर्यजनक रूप से छाने लगा है।
पिछले दिनों प्रेस क्लब में इसे लेकर बहस भी हुई। और अब तो अधिकांश पत्रकार पक्षकार की भूमिका में नजर आने लगे हैं। इसकी वजह भी साफ है पहले पत्रकारिता एक मिशन हुआ करता है अब प्रोफेशन हो चुका है। दो रोटी कमाने या घर चलाने की जद्दोजहद ने उन्हें सचेत कर दिया है कि उन्हें मालिक के पसंद ना पसंद का ध्यान रखना आता है। भले ही पत्रकारों के लिए नौकरी का स्कोप बहुत है लेकिन अच्छी संस्था में नौकरी के लिए बिना रीढ़ का बनना जरूरी है।
और अंत में...
एक आर्ड जी ने अपने चहते पत्रकारों से कहा कि मंत्री के दबाव पर कबाड़ माफिया और दामाद भाई को पुलिस नहीं गिरफ्तार कर रही है तो तत्काल एक पत्रकार ने कहा आप तों खाली चाय पिला देते हो और भी तो चाहिए न। फिर आप हमेशा नहीं होगे। नगर भैया को तो यही रहना है।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

घर का जोगी जोगरा

वैसे तो राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में प्रिंट मिडिया में हरियाली आई है ; रोज खुल रहे अखबारों का ध्येय सिर्फ सरकारी विज्ञापन लेना है ,लेकिन जनसंपर्क विभाग का रवैया आश्चर्यजनक है , उसे तो स्थानीय अखबारों से कोई लेना देना नहीं है ! वह तो यह मानकर चलता है कि यहाँ निकलने वाले साप्ताहिक या पाक्षिक अखबार केवल विज्ञापन लेने ही निकल रहे है , इसलिए वह ऐसे लोगो को न तो पत्रकार मानती है और न ही अखबार !
जनसंपर्क विभाग का अपना खेल है , कहने को तो यह विभाग सर्कार कि नीतियों के प्रचार-प्रसार के लिए बना है लेकिन यहाँ बठे अधिकारी इसमे भी अपने कमी का जरिया ढूंढ़ लेते है , यही वजह है कि वे स्थानीय पत्रकारों कि बजे बाहरी पत्रकारों को अधिक महत्व देते है, ताकि उनकी करतूत ढंकी रहे और विज्ञापन देने के एवज में मोती कमीशन भी ले सके !
कहा जाता है कि यहाँ जारी होने वाले कुल विज्ञापनों का ४० फीसदी हिस्सा बहार के अखबारों को जाता है, जिसमे मासिक पत्रिका को दिए जाने वाले विज्ञापन कि राशी अलग है जो लाखो रुपये में होता है और इससे कमीशन भी तगरा बनता है! अब तो यहाँ के अधिकारी अपने चहेते पत्रकारों को बहार के अखबारों का संवाददाता भी बनवाते है ताकि जरुरत पराने पर ये पत्रकार उनके कम आ सके ! इसके अलावा प्रचार-प्रसार के नाम पर लाखो रूपया कमीशन के रूप में खाया जाता है ! जनसंपर्क द्वारा प्रकाशित किये जाने वाले पतिका कि न केवल संख्या ब़र जाती है बल्कि प्रिंटर्स से छपाई करवाने के aएवज में मोटी रकम भी ली जाती है ! मुख्यमंत्री के विभाग कि इस हालत की शिकायत भी कि जा चुकी है लेकिन इन शिकायतों को रद्दी कि टोकरी में दल दिया जाता है, प्रचार सामग्री में कमीशन के अलावा यहाँ कई तरह के घपले भी सामने आने लगे है , अतिथि सत्कार खर्च ही लाखो में होता है जो पत्रकारों के नाम पर खर्च करना दिखाया जाता है, इसके अलावा वहां से लेकर नियुक्ति तक में यहाँ बरी आर्थिक अनियमितता की खबरे है और इसकी जाँच हुई तो कई लोगो की नौकरी तक जा सकती है!
और अंत मे ...
पिछले दिनों एक साप्ताहिक वाले ने जनसंपर्क से अखबारों की सूचि मांगी जनसंपर्क ने जब सूचि दी तोवह यह देखकर भौच्चक रह गया कि usake akhabar ka nam regular nikalane wale suchi me nahi tha jabaki us suchi me us akhabar ka nam tha jo char varsh se chhap nahi raha hai!