वैशाली नगर के उपचुनाव में भाजपा पराजित हो गई और कांग्रेस जीत गई। इस हार जीत को लेकर मीडिया में मौजूद राजनैतिक समीक्षकों के अपने दावे है। परिणाम आने के पहले भी यहां के प्रतिष्ठत अखबारों ने उपचुनाव के परिणाम को लेकर क्या कुछ नहीं छापा। इस समीक्षा को लेकर मीडिया की भूमिका पर सवाल भी उठे। लेकिन अपने मुंह के लिए विख्यात पूर्व भाजपा नेता वीरेन्द्र पाण्डे इन दिनों किसानों के साथ खड़ें है। वे किसानों के साथ ऐसे अचानक क्यों खड़े है। यह तो वे ही जाने लेकिन 7 नवम्बर को वे प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार वार्ता में डॉ. रमन सिंह के खिलाफ विषवयन करते-करते विपक्षी दलों की भूमिका पर तो भड़के ही मीडिया पर भी बिफर पड़े। उन्होंने कहा कि रमन सरकार को लेकर संचार माहयमों की भूमिका भी संदिग्ध है। इतने पर भी वे चुप नहीं रहे उन्होंने बताया कि मतदान की सुबह यहां से निकलने वाले प्रतिष्ठित आखबारों ने रमन के रोड शो के साथ भाजपा की जीत को जोड़ते हुए खबरें छापी। वीरेन्द्र पाण्डे के आरोपों पर किसी भी पत्रकार ने कोई सवाल इसलिए भी नहीं उठाया क्योंकि पत्रकार जानते हैं कि इस तरह की खबरें प्रतिष्ठत व बड़े आखबार एक साथ कब और क्यों छापते है। आखबारों के साथ पत्रकारों की विश्वसनियता घटने की वजह भी यही है कि आखबार मालिक सरकारी विज्ञापन या भ्रष्टमंत्रियों के पैसों के सामने घुटने टेक देते है और सब कुछ फिल्ड में काम करने वाले पत्रकारों को झेलना पड़ता है। वीरेन्द्र पाण्डे अपनी बेबाक छवि के लिए जाने जाते हैं इसलिए भी अपनी भड़ास निकाल पाये। मीडिया की इस नई भूमिका को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। कसडोल के विधायक राजकमल सिंघानिया से त्रस्त सैनी परिवार के द्वारा लिए गए पत्रकारवार्ता का हश्र सबकों मालूम है फिर सैनी परिवार क्यों बड़े आखबार पर विश्वास करे। वर्तमान में बड़े आखबार जिस तरह से जीभ लपलपाने लगे हैं उससे छोटे आखबारों की स्थिति और भी खराब हुई है अब वे भी बड़े आखबारों की राह पर चलने लगे है तो फिर पत्रकारिता को जिल्लत उठानी ही पड़ेगी।
और अंत ......
में जनसंपर्क विभाग इन दिनों मुख्यमंत्री के सचिव ब्रजेन्द्र कुमार सिंह लेकर चर्चा में हैं। अभी तक तो सीपीआर-डीपीआर आफिस ही जाते थे लेकिन ब्रजेन्द्र कुमार महीनों आफिस नहीं आते। अब जिसे संबंध बनाना हो वे मंत्रालय जाये। लेकिन कुछ लोगों की पीड़ा इतनी बस नहीं है असली पीड़ा तो उनकी द्धिवेदी व कुरेटी है जिनकी वे शिकायत करके भी मन हल्का नहीं कर पा रहे है। मंत्रालय के लिए पास का जो झंझट है।
गुरुवार, 11 मार्च 2010
अखबार बना धंधेबाज
पूरी तरह से व्यवसायिक रुप ले चुकी छत्तीसगढ क़े बड़े अखबारों ने नगरीय निकाय के चुनाव में जितना बड़ा पैकेज उतना बड़ा मैसेज, की राह पर चलकर बेशर्मी की सारी हदें तो पार की ही आम आदमी के विश्वास पर भी प्रहार किया है।
इतना ही नहीं मिशन मानी जाने वाली इस संस्था पर जिस तरह से धंधेबाजी करने के आरोप लगने लगे हैं वह इसकी विश्वसनियता के लिए ठीक नहीं है। कभी अखबारों पर छपने वाली खबरों के आधार पर सरकार कार्रवाई करती थी लेकिन अब कार्रवाई नहीं होती तो इसकी वजह अखबार मालिकों का धंधेबाजी वाला रूख है। सत्ता हिलाने का दंभ भरने वाले पत्रकार भी अब सिर्फ नौकरी कर रहे हैं और अपनी कलमों को गिरवी रख दिया है।
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की अपनी पहचान रही है। यहां निकलने वाले अखबारों के मालिकों ने भी धंधेबाजों की भूमिका से अपने को हमेशा दूर ही रखा लेकिन राय बनने के बाद अखबारों मालिकों का रवैया बदला है।
पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित अखबार ने जब अपने कवर पृष्ठ पर तेल वाला विज्ञापन छापा तो इस अखबार के संपादक ने इस्तीफा सौंप दिया था। लेकिन जब इसी अखबार के प्रबल प्रतिद्वंदी दैनिक भास्कर ने चार दिन पहले पूरे कवर पेज पर विज्ञापन प्रकाशित किया तो इस अखबार के पत्रकारों को कितनी शर्मिन्दगी उठानी पड़ी इसका अंदाजा शायद अखबार मालिक को भी नहीं होगा। बेचारे पत्रकार किसी के सामने मुंह खोलने की स्थिति में नहीं रह गए है। नीचे गिर कर धंधा करने की इस शैली की जगह-जगह आलोचना भी हो रही है।
और अंत में....
कवर पेज में पूरा पृष्ठ विज्ञापन छपने को लेकर जितनी मुंह उतनी बाते हो रही है कोई इसे पत्रकारिता के लिए कलंक तो कोई इसे बेशर्मी करार दे रहा है। ऐसे में इस अखबार से जुड़े पत्रकार की प्रतिक्रिया थी। अखबारी जमीन पर शॉपिंग मॉल मुफ्त में थोड़ी बन जाएगा।
इतना ही नहीं मिशन मानी जाने वाली इस संस्था पर जिस तरह से धंधेबाजी करने के आरोप लगने लगे हैं वह इसकी विश्वसनियता के लिए ठीक नहीं है। कभी अखबारों पर छपने वाली खबरों के आधार पर सरकार कार्रवाई करती थी लेकिन अब कार्रवाई नहीं होती तो इसकी वजह अखबार मालिकों का धंधेबाजी वाला रूख है। सत्ता हिलाने का दंभ भरने वाले पत्रकार भी अब सिर्फ नौकरी कर रहे हैं और अपनी कलमों को गिरवी रख दिया है।
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की अपनी पहचान रही है। यहां निकलने वाले अखबारों के मालिकों ने भी धंधेबाजों की भूमिका से अपने को हमेशा दूर ही रखा लेकिन राय बनने के बाद अखबारों मालिकों का रवैया बदला है।
पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित अखबार ने जब अपने कवर पृष्ठ पर तेल वाला विज्ञापन छापा तो इस अखबार के संपादक ने इस्तीफा सौंप दिया था। लेकिन जब इसी अखबार के प्रबल प्रतिद्वंदी दैनिक भास्कर ने चार दिन पहले पूरे कवर पेज पर विज्ञापन प्रकाशित किया तो इस अखबार के पत्रकारों को कितनी शर्मिन्दगी उठानी पड़ी इसका अंदाजा शायद अखबार मालिक को भी नहीं होगा। बेचारे पत्रकार किसी के सामने मुंह खोलने की स्थिति में नहीं रह गए है। नीचे गिर कर धंधा करने की इस शैली की जगह-जगह आलोचना भी हो रही है।
और अंत में....
कवर पेज में पूरा पृष्ठ विज्ञापन छपने को लेकर जितनी मुंह उतनी बाते हो रही है कोई इसे पत्रकारिता के लिए कलंक तो कोई इसे बेशर्मी करार दे रहा है। ऐसे में इस अखबार से जुड़े पत्रकार की प्रतिक्रिया थी। अखबारी जमीन पर शॉपिंग मॉल मुफ्त में थोड़ी बन जाएगा।
जो दिखता है वही बिकता है
अखबार की दुनिया भी अपनी तरह की दुनिया है। स्वयं को दिखाने की कोशिश में तामझाम के साथ-साथ अब ईनामी ड्रा भी निकाले जाते हैं ताकि पाठकों को खबर की बजाए ईनाम के लालच में अपना अखबार बेच सके।
राजधानी में तो इन दिनों गजब का नजारा है। नवभारत जैसे प्रतिष्ठित अखबार रीड एंड वीन के जरिये पाठक तक पहुंच रहा है। कभी छत्तीसगढ़ की धड़कन माने जाने वाला यह अखबार भी अब अपने प्रतिद्वंदियों से भयभीत है तो इसकी वजह अखबार का बाजारीकरण है।
दैनिक भास्कर तो तंबोला के जादू से अखबार बेचने आमदा है जबकि दैनिक भास्कर की टीम तोड़कर नए कलेवर में निकलने वाले अखबार नेशनल लुक को भी खबरों से यादा रद्दी इकट्ठा करने में भरोसा है वह तो पुराना एक माह का पेपर लाने पर 90 रुपए तक दे रहा है।
बाजारीकरण के इस दौड़ में हर चीज को बिकाऊ मानने वाले इन अखबारों को मालूम है कि सिर्फ अखबार बेचकर पैसा नहीं कमाया जा सकता। जितना अखबार बिकेगा उतना विज्ञापन मिलेगा और यही असली कमाई है।
इसलिए अखबार बेचने के लिए राजधानी के अखबारों में ऐसी प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। वैसे भी अखबार अब पूरी तरह से व्यवसायिक हो चुका है और एक अच्छे दुकानदार की तरह अखबारों में भी ऐसी खबरें कम ही छपती है जिससे सरकार रूपी मजबूत ग्राहक नाराज हो जाए।
सरकार में बैठे लोगों के लूटखसोट या फिर गलत कामों पर भी अखबार खामोश रहे या बड़े इंडस्ट्रीज में होने वाली घटना पर नाम नहीं छापना अब आम बात हो गई है और जब अखबारों में खबरें न हो तो ग्राहकों को पटाने सेल तो लगाने ही पड़ेंगे और जब पूरा जमाना ही दिखता है तो बिकता है वाली हो तो फिर अखबार के धंधेबाज इससे दूर कैसे रह सकते है।
इसलिए राजधानी के अखबार भी ग्राहकों को छोटे-छोटे ईनाम देकर सरकार से बड़ी राशि लूटने में लगे हैं। ऐसे ईनामी ड्रा लॉटरी के श्रेणी में नहीं आते क्योंकि ये नगद नहीं होते और न ही सीधे तौर पर टिकिट बेची जा रही है कहना मुश्किल है। अब ईनाम के लालच में कोई 10-20 अखबार खरीदे भी तो यह उसकी ही गलती है।
और अंत में....
नगर निगम चुनाव में कांग्रेस और भाजपा को छोड अन्य प्रत्याशियों की पीड़ा यह है कि भले ही वे चुनाव जीतने में सक्षम है लेकिन मीडिया उन्हें कवर नहीं कर रहा है। अब भला ऐसे प्रत्याशियों को कोई कैसे समझाये कि सिर्फ दमदार होने से काम नहीं चलेगा। मालदार भी होना पड़ेगा।
राजधानी में तो इन दिनों गजब का नजारा है। नवभारत जैसे प्रतिष्ठित अखबार रीड एंड वीन के जरिये पाठक तक पहुंच रहा है। कभी छत्तीसगढ़ की धड़कन माने जाने वाला यह अखबार भी अब अपने प्रतिद्वंदियों से भयभीत है तो इसकी वजह अखबार का बाजारीकरण है।
दैनिक भास्कर तो तंबोला के जादू से अखबार बेचने आमदा है जबकि दैनिक भास्कर की टीम तोड़कर नए कलेवर में निकलने वाले अखबार नेशनल लुक को भी खबरों से यादा रद्दी इकट्ठा करने में भरोसा है वह तो पुराना एक माह का पेपर लाने पर 90 रुपए तक दे रहा है।
बाजारीकरण के इस दौड़ में हर चीज को बिकाऊ मानने वाले इन अखबारों को मालूम है कि सिर्फ अखबार बेचकर पैसा नहीं कमाया जा सकता। जितना अखबार बिकेगा उतना विज्ञापन मिलेगा और यही असली कमाई है।
इसलिए अखबार बेचने के लिए राजधानी के अखबारों में ऐसी प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। वैसे भी अखबार अब पूरी तरह से व्यवसायिक हो चुका है और एक अच्छे दुकानदार की तरह अखबारों में भी ऐसी खबरें कम ही छपती है जिससे सरकार रूपी मजबूत ग्राहक नाराज हो जाए।
सरकार में बैठे लोगों के लूटखसोट या फिर गलत कामों पर भी अखबार खामोश रहे या बड़े इंडस्ट्रीज में होने वाली घटना पर नाम नहीं छापना अब आम बात हो गई है और जब अखबारों में खबरें न हो तो ग्राहकों को पटाने सेल तो लगाने ही पड़ेंगे और जब पूरा जमाना ही दिखता है तो बिकता है वाली हो तो फिर अखबार के धंधेबाज इससे दूर कैसे रह सकते है।
इसलिए राजधानी के अखबार भी ग्राहकों को छोटे-छोटे ईनाम देकर सरकार से बड़ी राशि लूटने में लगे हैं। ऐसे ईनामी ड्रा लॉटरी के श्रेणी में नहीं आते क्योंकि ये नगद नहीं होते और न ही सीधे तौर पर टिकिट बेची जा रही है कहना मुश्किल है। अब ईनाम के लालच में कोई 10-20 अखबार खरीदे भी तो यह उसकी ही गलती है।
और अंत में....
नगर निगम चुनाव में कांग्रेस और भाजपा को छोड अन्य प्रत्याशियों की पीड़ा यह है कि भले ही वे चुनाव जीतने में सक्षम है लेकिन मीडिया उन्हें कवर नहीं कर रहा है। अब भला ऐसे प्रत्याशियों को कोई कैसे समझाये कि सिर्फ दमदार होने से काम नहीं चलेगा। मालदार भी होना पड़ेगा।
कानून का तोड़ अखबारों में
नगर निगम का चुनाव आते ही राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों के साथ अखबार वाले भी सक्रिय हो गए हैं। अखबारों को मालूम है कि चुनावी खर्च की राशि सीमित है और ऐसे में विज्ञापन का दबाव काम नहीं आने वाला है। प्रत्याशी भी चुनावी खर्च की सीमा से बंधे हैं यदि राजधानी के बड़े अखबारों को विज्ञापन दिए जाए तो चुनावी खर्च की सीमा समाप्त हो जाएगी तब भला वे आम लोगों को किस तरह से प्रभावित करेंगे। ऐसे में अखबार वालों ने भी रास्ता निकाल लिया है कि विज्ञापन की बजाय पक्ष में खबरें प्रकाशित की जाएगी। इससे प्रत्याशी चुनावी खर्च के हिसाब से तो बच ही जाएगा मतदाता भी खबरों से प्रभावित होकर वोट डाल सकता है।
राजधानी में चुनाव आयोग को ठेंगा दिखाने वाले इस करतूत में वे अखबार भी शामिल हैं जो अपने आप को प्रतिष्ठित व नम्बर वन की दौड़ में खड़ा करते हैं। कानून की अवहेलना करने वालों के खिलाफ खबरें छापने वाले अखबार किस तरह से कानून का माखौल उड़ाने के तरीके अपनाते है यह शर्मनाक है।
राजधानी के छोटे अखबार यदि ये तरीके अख्तियार करते तो यही बड़े अखबार के रिपोर्टर इसे शर्मनाक कहते नहीं थकते लेकिन अब तो बड़े अखबार भी पैसे कमाने की दौड़ में कानून की धाियां उड़ाने आमदा है।
ऐसे ही एक प्रतिष्ठित अखबार ने तो बकायदा स्कीम बना कर पार्षद प्रत्याशियों से संपर्क कर रहे हैं। एक वार्ड में एक ही प्रत्याशी को जीताने का ठेका लेने वाले इस अखबार के जाल में दर्जनभर से यादा प्रत्याशी फंस चुकेहैं। हालांकि कौन प्रत्याशी नहीं चाहेगा कि चुनावी खर्च के झंझट से बाचते हुए इस बड़े अखबार में फोटो छपे।
एक अखबार ने तो पार्टी स्तर पर बात कर ली है कि वह पार्टी प्रत्याशियों की फोटो छापेगा और उसे ही दमदार बतायेगा। जबकि छोटे अखबार तो 5 सौ-हजार कॉपी और कुछ रकम के एवज में प्रशंसा करने आतुर है।
चुनाव आयोग को ठेंगा दिखाने बनी इस तरह की योजनाओं से अखबार को तत्कालीन फायदा तो मिलेगा लेकिन अखबारों की विश्वसनियता पर सवाल उठेंगे। पत्रकारिता के इस गिरते स्तर को लेकर अब एक नई बहस भी शुरू हो गई है लेकिन इस बहस से अखबार मालिकों को कोई लेना-देना नहीं है।
और अंत में....
पिछले चुनावों में अखबारों के भुक्तभोगी एक पार्षद ने कहा कि पिछली बार तो केवल दो बड़े अखबार थे इस बार चार बड़े अखबारों को झेलना है। चुनाव जीतना है तो किसी को नाराज भी नहीं कर सकते। क्या बताऊं भैय्या ऐसे ऐसे दबाव आते हैं अब अपनी म....... किसे बतायें?
राजधानी में चुनाव आयोग को ठेंगा दिखाने वाले इस करतूत में वे अखबार भी शामिल हैं जो अपने आप को प्रतिष्ठित व नम्बर वन की दौड़ में खड़ा करते हैं। कानून की अवहेलना करने वालों के खिलाफ खबरें छापने वाले अखबार किस तरह से कानून का माखौल उड़ाने के तरीके अपनाते है यह शर्मनाक है।
राजधानी के छोटे अखबार यदि ये तरीके अख्तियार करते तो यही बड़े अखबार के रिपोर्टर इसे शर्मनाक कहते नहीं थकते लेकिन अब तो बड़े अखबार भी पैसे कमाने की दौड़ में कानून की धाियां उड़ाने आमदा है।
ऐसे ही एक प्रतिष्ठित अखबार ने तो बकायदा स्कीम बना कर पार्षद प्रत्याशियों से संपर्क कर रहे हैं। एक वार्ड में एक ही प्रत्याशी को जीताने का ठेका लेने वाले इस अखबार के जाल में दर्जनभर से यादा प्रत्याशी फंस चुकेहैं। हालांकि कौन प्रत्याशी नहीं चाहेगा कि चुनावी खर्च के झंझट से बाचते हुए इस बड़े अखबार में फोटो छपे।
एक अखबार ने तो पार्टी स्तर पर बात कर ली है कि वह पार्टी प्रत्याशियों की फोटो छापेगा और उसे ही दमदार बतायेगा। जबकि छोटे अखबार तो 5 सौ-हजार कॉपी और कुछ रकम के एवज में प्रशंसा करने आतुर है।
चुनाव आयोग को ठेंगा दिखाने बनी इस तरह की योजनाओं से अखबार को तत्कालीन फायदा तो मिलेगा लेकिन अखबारों की विश्वसनियता पर सवाल उठेंगे। पत्रकारिता के इस गिरते स्तर को लेकर अब एक नई बहस भी शुरू हो गई है लेकिन इस बहस से अखबार मालिकों को कोई लेना-देना नहीं है।
और अंत में....
पिछले चुनावों में अखबारों के भुक्तभोगी एक पार्षद ने कहा कि पिछली बार तो केवल दो बड़े अखबार थे इस बार चार बड़े अखबारों को झेलना है। चुनाव जीतना है तो किसी को नाराज भी नहीं कर सकते। क्या बताऊं भैय्या ऐसे ऐसे दबाव आते हैं अब अपनी म....... किसे बतायें?
दलालों के जाल में बड़े अखबार
अब जमाना बदल गया है इसके साथ अखबारों की सोच में भी बदलाव हुआ है। कभी मिशन के रुप में चलने वाला इस धंधे पर अब पूरी तरह व्यवसायिकता हावी है और इस व्यवसाय को सत्ता के दलालों ने अपने कब्जे में कर लिया है।
प्रतिष्ठित अखबारों के रुप में अपनी पहचान बना चुके अखबारों में सत्ता के दलाल किस कदर हावी है इसकी कल्पना आम आदमी शायद ही कर पाए। ऐसा ही मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाला एक अखबार जो छत्तीसगढ़ में स्वयं को स्थापित करने में लगा है। इस अखबार ने स्वयं को स्थापित करने पाठकों की बजाय सत्ता के एक ऐसे दलाल को अपने पाले में कर रखा है जो भाजपा के एक प्रदेश पदाधिकारी का न केवल रिश्तेदार है बल्कि भाजपाई उसे आम बोल चाल में सीएम का दत्तक पुत्र भी कहते हैं।
यह अलग बात है कि उसने इस अखबार को जमीन दिलाते-दिलाते स्वयं के लिए कौड़ी मोल में सरकारी जमीन हथिया ली। पेशे से डाक्टर इस दलाल के बारे में यह भी चर्चा है कि वह इस अखबार के परिशिष्ठ के लिए सरकार से लाखों रुपए का विज्ञापन तक दिलवाता है।
यह सिर्फ एक अखबार की कहानी है। ऐसे ही कई सत्ता के या मंत्री के दलाल रोज शाम संपादकों के कमरे में कॉफी की चुस्कियां लेते दिखाई पड़ जाएंगे।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि स्वयं के अखबार में खबर नहीं छाप पाने वाले ये संपादक दूसरे पत्रकारों तक को दलाली करने की प्रेरणा देते नहीं शर्माते। सत्ता के दलालों के चंगुल में फंसते अखबार खबरों को किस तरह से पेश करते होंगे। समझा जा सकता है।
और अंत में...
किसानों के आंदोलन को असफल बनाने जब पूरा सरकारी तंत्र लगा हुआ था तब जनसंपर्क विभाग का एक अधिकारी सरकार के निर्देशों के विरुध्द पत्रकारों को फोन कर इसकी सफलता की कहानी सुनाने में व्यस्त था। सालों से जमें इस अधिकारी के रवैये से पत्रकार भी हैरान थे कि आखिर कुर्सी पाते ही ये सरकार के विरोधी कैसे हो गए।
प्रतिष्ठित अखबारों के रुप में अपनी पहचान बना चुके अखबारों में सत्ता के दलाल किस कदर हावी है इसकी कल्पना आम आदमी शायद ही कर पाए। ऐसा ही मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाला एक अखबार जो छत्तीसगढ़ में स्वयं को स्थापित करने में लगा है। इस अखबार ने स्वयं को स्थापित करने पाठकों की बजाय सत्ता के एक ऐसे दलाल को अपने पाले में कर रखा है जो भाजपा के एक प्रदेश पदाधिकारी का न केवल रिश्तेदार है बल्कि भाजपाई उसे आम बोल चाल में सीएम का दत्तक पुत्र भी कहते हैं।
यह अलग बात है कि उसने इस अखबार को जमीन दिलाते-दिलाते स्वयं के लिए कौड़ी मोल में सरकारी जमीन हथिया ली। पेशे से डाक्टर इस दलाल के बारे में यह भी चर्चा है कि वह इस अखबार के परिशिष्ठ के लिए सरकार से लाखों रुपए का विज्ञापन तक दिलवाता है।
यह सिर्फ एक अखबार की कहानी है। ऐसे ही कई सत्ता के या मंत्री के दलाल रोज शाम संपादकों के कमरे में कॉफी की चुस्कियां लेते दिखाई पड़ जाएंगे।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि स्वयं के अखबार में खबर नहीं छाप पाने वाले ये संपादक दूसरे पत्रकारों तक को दलाली करने की प्रेरणा देते नहीं शर्माते। सत्ता के दलालों के चंगुल में फंसते अखबार खबरों को किस तरह से पेश करते होंगे। समझा जा सकता है।
और अंत में...
किसानों के आंदोलन को असफल बनाने जब पूरा सरकारी तंत्र लगा हुआ था तब जनसंपर्क विभाग का एक अधिकारी सरकार के निर्देशों के विरुध्द पत्रकारों को फोन कर इसकी सफलता की कहानी सुनाने में व्यस्त था। सालों से जमें इस अधिकारी के रवैये से पत्रकार भी हैरान थे कि आखिर कुर्सी पाते ही ये सरकार के विरोधी कैसे हो गए।
जमीन हड़पने की कोशिशें तेज....
छत्तीसगढ़ राय बनने के पहले ही यहां के अखबारों ने कौड़ी के मोल सरकारी जमीनों को हथियाने का खेल शुरू कर दिया। वैसे जानकारों का कहना है कि मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने अपने कार्यकाल में न केवल अखबार मालिकों को लाखों रुपये का विज्ञापन देकर खुश किया बल्कि प्रदेश के सभी बड़े शहरों की सबसे महंगी भूखंडों को भी कौडियों के मोल में इन अखबार वालों को दिया। यह अर्जुन सिंह जी की एक हाथ ले और एक हाथ दे कि नीति थी और इसका उन्होंने भरपूर फायदा भी उठाया फिर छत्तीसगढ़ राय बना तो यही खेल शुरू हुआ और रजबंधा तालाब जो मैदान रह गया वहां जमीनें दी गई। ऐसा नहीं है कि जमीनें केवल अखबार वालों को ही दी गई भाजपा शासनकाल में तो यहां भाजपा कार्यालय के नाम पर जमीन दी गई और जमीन का एक बड़ा हिस्सा बिल्डरों को दूकानें बनाकर बेचने के लिए दी गई।
रजबंधा में जो जमीनें दी गई उनके उपयोग को लेकर सवाल उठते रहे हैं कि आखिर अखबार चलाने के लिए दी गई जमीनों का कोई दूसरा उपयोग कैसे कर सकता है। दूनिया को निगम कानून सीखाने वाले अखबार मलिक अपने हिस्से की इन जमीनों का उपयोग क्या नियम कानून के तहत कर रहे हैं। यह एक ऐसा सवाल है जो अखबार के गिरते स्तर को प्रदर्शित करता है।
आम आदमी भले ही कुछ न करें लेकिन उसे मालूम है कि कौन-कौन अखबार वाले इन जमीनों का व्यवसायिक उपयोग कर रहे हैं और राजधानी में बैठे अधिकारी तो सिर्फ नौकरी कर रहे हैं. उन्होंने शायद अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है इसलिए वे भी इनके खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पाते। कहा जाता है कि जब प्रशासन नपुसंक हो जाए को अराजकता की स्थिति बनती है और अखबारों के मामले में प्रशासन का यह रवैया आम आदमी को चुभने लगा है।
और अंत में
कभी श्रमजीवियों को बेशरमजीवी कहने वाले एक पत्रकार ने मलिक बनते ही न केवल श्रमजीवियों की जमीनें हड़पी बल्कि अब वह यहं व्यवसायिक काम्प्लेक्स भी बना रहा है ऐसे में उनकी पत्रकारिता पर ऊंगली उठना स्वभाविक है।
रजबंधा में जो जमीनें दी गई उनके उपयोग को लेकर सवाल उठते रहे हैं कि आखिर अखबार चलाने के लिए दी गई जमीनों का कोई दूसरा उपयोग कैसे कर सकता है। दूनिया को निगम कानून सीखाने वाले अखबार मलिक अपने हिस्से की इन जमीनों का उपयोग क्या नियम कानून के तहत कर रहे हैं। यह एक ऐसा सवाल है जो अखबार के गिरते स्तर को प्रदर्शित करता है।
आम आदमी भले ही कुछ न करें लेकिन उसे मालूम है कि कौन-कौन अखबार वाले इन जमीनों का व्यवसायिक उपयोग कर रहे हैं और राजधानी में बैठे अधिकारी तो सिर्फ नौकरी कर रहे हैं. उन्होंने शायद अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है इसलिए वे भी इनके खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पाते। कहा जाता है कि जब प्रशासन नपुसंक हो जाए को अराजकता की स्थिति बनती है और अखबारों के मामले में प्रशासन का यह रवैया आम आदमी को चुभने लगा है।
और अंत में
कभी श्रमजीवियों को बेशरमजीवी कहने वाले एक पत्रकार ने मलिक बनते ही न केवल श्रमजीवियों की जमीनें हड़पी बल्कि अब वह यहं व्यवसायिक काम्प्लेक्स भी बना रहा है ऐसे में उनकी पत्रकारिता पर ऊंगली उठना स्वभाविक है।
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